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| कुंडली बताएगी प्रेम विवाह योग:-
शनि का परिभ्रमण:- शनि जब चंद्र कुंडली में परिभ्रमण करता है तो क्या फल देता है और क्या संभावनाएँ रहती हैं, जानिए। प्रथम : शनि का चंद्रकुंडली के प्रथम स्थान में भ्रमण नजदीकी रिश्तेदारों के लिए अशुभ रहता है। बीमारी के योग रहते हैं। द्वितीय : शनि चंद्रकुंडली के दूसरे भाव में जब प्रवेश करता है तो खुशियों में कमी आ सकती है। बीमारी हो सकती है। यह धनहानि कराता है। नौकरीपेशा निलंबित या पदविहीन हो सकता है। खर्च को बढ़ाता है। स्वास्थ्य कमजोर रह सकता है। तृतीय : इस भाव में शनि आने के आने पर धनोपार्जन करवाता है। खुशियाँ देता है। चतुर्थ : यह भाव मानसिक, शारीरिक कष्ट और परिवार के लिए अशुभ फल देता है। अनहोनी घटनाएँ होती हैं। पंचम : इससे धननाश, खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है। गलत आक्षेप लगवा सकता है। षष्ठम : शत्रुओं पर विजय दिलवाता है। मुख्य कार्य करवाता है और बीमारी से दूर रखता है। बीमार व्यक्ति बीमारी से मुक्त हो जाता है। वैवाहिक जीवन में सुख देता है और धन की प्राप्ति कराता है। सप्तम : इस भाव में शनि यात्राएँ कराता है। जातक घर से दूर रहता है, परंतु उसे गुप्त रोग या जननांग में बीमारी होने का भय रहता है। अष्टम : यह भाव पत्नी और बच्चों से दूर कर सकता है। कभी-कभी तलाक भी दिला देता है। (अर्थात किसी जातक की निम्न राशि पर विराजे तब)। इसके अतिरिक्त रिश्तेदारों और नौकरों से कष्ट तथा धनहानि देता है। नवम : यह भाव शत्रुओं से हानि, किसी आपराधिक व्यक्ति द्वारा कष्ट, बीमारी, धनहानि पत्नी से अलगाव कराता है। दशम : शनि के इस भाव में बेरोजगार व्यक्ति को रोजगार प्राप्त हो जाता है, लेकिन किसी-किसी जातक को कार्य से सुकमय बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। एकादश : यह भाव जमीन-जायदाद की प्राप्ति कराता है। अविवाहित के विवाह का योग बनाता है। अस्थायी नौकरी वाला स्थायी होता है। द्वादश : इस भाव में शनि धनहानि देता है। बीमारी हो सकती है। पारिवारिक झगड़े करवाता है। कब मिलता है वैवाहिक सुख? विवाह योग्य होते ही तरुण-तरुणियों के मन में 'मेरा विवाह कब होगा?' क्या यह विवाह सफल होगा। जैसे प्रश्न उठने लगते हैं। कुंडली में विवाह सुख देखते समय कुछ बातों का अति प्रमुखता से विचार करना जरूरी है। 1. सप्तम स्थान 2. शुक्र और उसके सप्तम का ग्रह 3. सप्तम स्थान पर ग्रहों का प्रभाव 4. सप्तमेश की स्थिति 5. सप्तमेश के अन्य ग्रहों से होने वाले योग 6. चंद्र के सप्तम में स्थित ग्रह 7. शुक्र की स्थिति 8. शुक्र, सप्तमेश व चंद्र से सप्तम स्थित ग्रह का नक्षत्र 9. शुक्र पर ग्रहों का प्रभाव यदि ये सारी स्थितियाँ या अधिकांश स्थितियाँ अनुकूल हो तो विवाह सुखी जीवन की ओर अग्रसर होता है अन्यथा पाप प्रभाव होने पर परेशानियाँ आ सकती हैं। कब आता है विवाह योग :
विवाह में विलंब क्यों : सप्तम स्थान शनि की दृष्टि से प्रभावित हो, सप्तम में मंगल हो, राहु हो तो विवाह देर से होता है। सप्तम का केतु, यूरेनस विवाह के प्रति उदासीनता दिखाता है। नेपच्यून होने पर विवाह कई बार जुड़ते-जुड़ते टूटता है। (यदि सप्तम पर शुभ प्रभाव हो तो ये दोष कम हो जाते हैं) कुंडली में मांगलिक दोष निवारण जिस जातक की जन्म कुंडली लग्न/चंद्र कुण्डाल्यादि में मंगल ग्रह लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। जैसे उपरोक्त कुंडली में दर्शाया है। गोलिया मंगल 'पगड़ी मंगल' तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है। मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हों तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए। मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ठ भंग योग बना देता है। शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहाँ तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो 'पीपल' विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। इसे देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्यादि में ही प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं। विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय सौख्य विजय अभ्युदय और आनंदमय है। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें। 1. ऊँ मंगलाय नम: 2. ऊँ भूमि पुत्राय नम: 3. ऊँ ऋण हर्वे नम: 4. ऊँ धनदाय नम: 5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम: 6. ऊँ महाकाय नम: 7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम: 8. ऊँ लोहिताय नम: 9. ऊँ लोहितगाय नम: 10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम: 11. ऊँ धरात्मजाय नम: 12. ऊँ कुजाय नम: 13. ऊँ रक्ताय नम: 14. ऊँ भूमि पुत्राय नम: 15. ऊँ भूमिदाय नम: 16. ऊँ अंगारकाय नम: 17. ऊँ यमाय नम: 18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम: 19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम: 20. ऊँ प्रहर्त्रे नम: 21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम: विशेषकर किसी ज्योतिष से चर्चा करके ही पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है। acharya Kushal | कुंडली के नवम भाव से जानें पितृदोष:- जन्म कुंडली का नवम भाव बेहद महत्वपूर्ण भाव होता है। यह भाव पिता के सुख, आयु व समृद्धि का कारक है, वहीं यह जातक के स्वयं के भाग्य, तरक्की, धर्म संबंधी रुझान को बताता है। सूर्य पिता का कारक होता है, वहीं सूर्य जातक को मिलने वाली तरक्की, उसके प्रभाव क्षेत्र का कारक होता है। ऐसे में सूर्य के साथ यदि राहु जैसा पाप ग्रह आ जाए तो यह ग्रहण योग बन जाता है अर्थात सूर्य की दीप्ति पर राहु की छाया पड़ जाती है। ऐसे में जातक के पिता को मृत्युतुल्य कष्ट होता है, जातक के भी भाग्योदय में बाधा आती है, उसे कार्यक्षेत्र में विविध संकटों का सामना करना पड़ता है। जब सूर्य और राहु का योग नवम भाव में होता है, तो इसे पितृदोष कहा जाता है। निवारण : पितृदोष के बारे में मनीषियों का मत है कि पूर्व जन्म के पापों के कारण या पितरों के शाप के कारण यह दोष कुंडली में प्रकट होता है अतः इसका निवारण पितृ पक्ष में शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है।
चंद्रमा कुंडली के अनुसार जब बृहस्पति परिभ्रमण पर रहते हैं तो किस स्थान पर क्या परिणाम देते हैं एवं उससे क्या लाभ या हानि होती है। आइए जानें- प्रथम : आर्थिक कष्ट, चिंताएँ घेरती हैं और यात्राएँ होती हैं। रिश्तेदारों से मनमुटाव कराता है। पृथक से द्वितीय स्थान : घर में खुशी का समावेश होता है। शत्रुओं का नाश कराता है। अविवाहित का विवाह और गृहस्थी वाले के यहाँ बच्चे का जन्म, धनप्राप्ति कराता है अर्थात पूर्ण सुख देता है। तृतीय : धन की कमी कराता है। रिश्तेदारों से कटुता और कार्य में असफलता दिलाता है। यात्रा में नुकसान, बीमारी और स्थान परिवर्तन होता है। चतुर्थ : किसी मित्र या रिश्तेदार से अपमानित कराता है। जातक को गलत कार्य के लिए प्रेरित करता है। साथ ही चोर का भय होता है। पंचम : राजकार्य में सफलता दिलाता है। उच्च अधिकारियों से सम्मान मिलता है। जातक को नए पद की प्राप्ति (पदोन्नति) दिलाता है। बेरोजगार को नौकरी, पुत्र की प्राप्ति होती है। घर में शुभ कार्य होता है। जमीन-जायदाद और अन्य प्रकार के वैभव, विलासिता की वस्तुओं की खरीदी करवाता। षष्ठम : घर में झगड़े करवाता है और कष्ट देता है। रिश्तेदारों से मनमुटाव की स्थिति उत्पन्न होती है। धनहानि, खर्च बढ़ाता है। सप्तम : पारिवारिक खुशियाँ देता है। शादी व नए संबंध कराता है। धन की प्राप्ति देता है। नए विषय का ज्ञान देता है। वाहन सुख तथा बच्चे का जन्म होता है। अष्टम : अशुभ होता है। घर कलह, शारीरिक कष्ट, मानसिक तनाव आदि कई प्रकार के कष्ट देता है। नवम : जातक को ज्ञानवृद्धि कराता है। कार्य करने की क्षमता बढ़ाता है। यानी कर्म करने की प्रेरणा जगाता है। दशम : बीमारी, धनहानि तथा कष्ट देता है। स्थान परिवर्तन कराता है। जायदाद का नुकसान देता है तथा जीवन कष्टमय कर देता है। एकादश : जीवन में खुशियाँ देता है। पूर्ण तंदुरूस्ती एवं धन की प्राप्ति कराता है। भूमिहीन को भूमि दिलाता है। मकान भी देता है। संतान की प्राप्ति भी कराता है। अविवाहित का विवाह होता है। द्वादश : कष्टप्रद जीवन देता है। मानसिक और शारीरिक तथा बौद्धिक कष्ट देकर तनाव से युक्त कर देता है। इति शुभम। ग्रहों के अनुरूप चुनें विषय दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही 'कौन-सा विषय चुनें' यह यक्ष प्रश्न बच्चों के सामने आ खड़ा होता है। माता-पिता को अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर एक नजर कुंडली पर भी मार लेनी चाहिए। बच्चे किस विषय में सिद्धहस्त होंगे, यह ग्रह स्थिति स्पष्ट बताती है। * विषय के चुनाव हेतु कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव का प्रमुख रूप से अध्ययन करना चाहिए। साथ ही लग्न यानी व्यक्ति के स्वभाव का भी विवेचन कर लेना चाहिए। ग्रहानुसार विषय : * यदि चौथे व पाँचवें भाव पर हो। 1. सूर्य का प्रभाव - आर्ट्स, विज्ञान 2. मंगल का प्रभाव - जीव विज्ञान 3. चंद्रमा का प्रभाव - ट्रेवलिंग, टूरिज्म, 4. बृहस्पति का प्रभाव - किसी विषय में अध्यापन की डिग्री 5. बुध का प्रभाव - कॉमर्स, कम्प्यूटर 6. शुक्र का प्रभाव- मीडिया, मास कम्युनिकेशन, गायन, वादन 7. शनि का प्रभाव- तकनीकी क्षेत्र, गणित इन मुख्य ग्रहों के अलावा ग्रहों की युति-प्रतियुति का भी अध्ययन करें, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचें। (जैसे शुक्र और बुध हो तो होम्योपैथी या आयुर्वेद पढ़ाएँ) ताकि चुना गया विषय बच्चे को आगे सफलता दिला सके। |
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, May 19 2009, 8:49 AM EDT
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| bbkewalrams | very good information | 0 | May 14 2009, 2:50 PM EDT by bbkewalrams | ||
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Namaskar Acharya ji,
Very good articles and also easy to understand . waiting for more articles . Pranam . Bharat Pandya |
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