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विवाह विलंब दूर करने के उपाय:-

कुछ ग्रहों के अशुभ प्रभाव के कारण कन्या के विवाह में विलंब हो तो इस प्रकार के उपाय स्वयं कन्या द्वारा करवाने से विवाह बाधाएँ दूर होती हैं :-

- किसी भी माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चाँदी की छोटी कटोरी में गाय का दूध लेकर उसमें शकर एवं उबले हुए चावल मिलाकर चंद्रोदय के समय चंद्रमा को तुलसी की पत्ती डालकर यह नेवैद्य बताएँ व प्रदक्षिणा करें। इस प्रकार यह नियम 45 दिनों तक करें। 45 दिन पूर्ण होने पर एक कन्या को भोजन करवाकर वस्त्र और मेहँदी दान करें। ऐसा करने से सुयोग्य वर की प्राप्ति होकर शीघ्र मांगलिक कार्य संपन्न होता है।

- गुरुवार के दिन प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर हल्दीयुक्त रोटियाँ बनाकर प्रत्येक रोटी पर गुड़ रखें व उसे गाय को खिलाएँ। 7 गुरुवार नियमित रूप से यह विधि करने से शीघ्र विवाह होता है।

- मंगलवार के दिन देवी-मंदिर में लाल गुलाब का फूल चढ़ाएँ, पूजन करें एवं मंगलवार का व्रत रखें। यह कार्य नौ मंगलवार तक करें। अंतिम मंगलवार को 9 वर्ष की नौ कन्याओं को भोजन करवाकर लाल वस्त्र, मेहँदी एवं यथाशक्ति दक्षिणा दें। शीघ्र फल की प्राप्ति होगी।

- कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंद गोपसुतं देवि पतिं में कुरु ने नमः॥ (कात्यायनिमंत्र श्रीमद् भागवत)

- माँ कात्यायनि देवी या पार्वतीदेवी के फोटो को सामने रखकर जो कन्या पूजन कर इस कात्यायनि मंत्र की 1 माला का जाप प्रतिदिन करती है, उस कन्या की विवाह बाधा शीघ्र दूर होती है।

- हे गौरी! शंकरर्धाङ्गिस यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा माँ कुरुं कल्याणिस कान्तं कान्तां सुदुर्लभाम्‌।

- भगवती पार्वती का पूजन कर इस मंत्र की 5 माला प्रतिदिन करने से शीघ्र वर प्राप्ति होती है।

- श्री गणपति अथर्वशीर्ष का प्रतिदिन 11 बार पाठ करें। अथर्वशीर्ष के प्रत्येक मंत्र से श्री गणेशजी की प्रतिमा पर दूर्वा चढ़ाएँ। इस प्रकार 84 दिनों तक नियमित करें, शीघ्र मनोकामना पूर्ण होगी।


वेदों में विवाह के कुछ खास नियम:-

विवाह के पश्चात ही पुरुष पुरुषत्व को प्राप्त होता है। विवाह होने पर पूर्ण पुरुष होता है और सदाचारी संतान उत्पन्न करके देश, धर्म, जाति सेवा के साथ देव, ऋषि, पितृऋण से भी उन्मुक्त हो सकता है। विवाह संस्कार सर्वश्रेष्ठ संस्कार है। इससे मनुष्य धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष की सिद्धि कर सकता है।

इस संस्कार को मुनियों ने श्रेष्ठ बताया है। यह संस्कार योग्य समय में होने पर ही दाम्पत्य सुख, ऐश्वर्य भोग और उत्तम प्रजोत्पादन करके मनुष्य अपने पितृ ऋण से मुक्त होता है। सर्वकाल विवाह के लिए शुभ मानकर चाहे जब रजिस्टर पद्धति से कोर्ट में जाकर तथा कपोल-कल्पित नियमानुसार विवाह करवा लेते हैं। यह सर्वथा अनुचित है। विवाह के लिए वेदों में भी पर्याप्त निर्णय है।


* क्या वर-कन्या का जन्म टाइम ठीक-ठीक है?





* कई वर्षों से प्राचीन गणित में अंतर आता है अतः ऐसे गणित से बनाया जन्म-पत्र ठीक-ठीक फलदायक नहीं हो सकता, इसलिए वर-कन्या के जन्म पत्र शुद्ध-सूक्ष्म एवं दृक्तुल्य केतकी गणित से ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बने हैं या नहीं? इसकी जाँच उत्तम गणितज्ञ से कराएँ।

* क्या ज्योतिषी ने बालक का जहाँ जन्म है वहीं का सूर्योदय लेकर जन्मपत्र बनाया है?

* क्या लग्न सारिणी एवं सूर्योदय जन्म स्थान को लेकर लग्न साधन किया है? इन बातों का निर्णय कर जन्मपत्र विद्वान गणितज्ञ से बनवाकर मिलाने पर ही वह मिलान योग्य होकर फलदायक होता है।

यदि कन्या और वर की जन्म कुंडली न हो और दोनों के नाम परस्पर मिलान में शुभ न हो तो आवश्यकता में कन्या का नाम बदला जा सकता है, वर का नहीं। वर का प्रसिद्ध नाम तथा कन्या का जन्म नाम, कन्या का प्रसिद्ध नाम और वर का जन्म- नाम ऐसा विपरीत कदापि न लें, यह वर-कन्या के लिए हानिप्रद है या दोनों का जन्म नाम ही लें और जन्म नाम न हो तो दोनों के प्रसिद्ध नाम लें।

विशेषतः दोनों के जन्म-नाम ही लेना शास्त्रोक्त और आवश्यक है। जन्म नाम प्राप्त न हो तो प्रसिद्ध नाम लेकर गुण मिलाएँ। वधू वर की सगोत्र और वर की माता की सातपीढ़ी में से न हो। दो सगी बहनों का विवाह दो सगे भाइयों से न करें। दो सगी बहनों का, दो सगे भाइयों का या भाई-बहनों का एक संस्कार 6 मास में साथ ही न करें। लड़की के विवाह के पीछे लड़के का विवाह हो सकता है।

पृथक माता (सौतेली) से हुए भाई-बहनों का एक संस्कार द्वार भेद, मंडप भेद और आचार्य भेद से हो सकता है। यमल (जोड़े) भाई-बहनों का एक ही मंडप में विवाह करने में हानि नहीं। इसी प्रकार विवाह से पीछे मुंडन, यज्ञोपवीत 6 मास तक न करें। विवाह, उपनयन, चूड़ा, सीमंत, केशांत से 6 मास तक लघु मंगलकार्य न करें। संवत्सर भेद से जैसे माघ, फाल्गुन में एक मंगल कार्य हो तो आगे चैत्र के बाद दूसरा मंगल कार्य कर सकते हैं, उसमें कोई दोष नहीं।

ऊपर कहा हुआ 6 मास का व्यवधान तीन पीढ़ी तक के ही पुरुषों को कहा है, अन्य पीढ़ी के पुरुषों को यह बंधन नहीं है। मंगल कार्य के मध्य पितृकर्म (श्राद्धादि) अमंगल कार्य न करें। वाग्दान के अनंतर वर कन्या के तीन पीढ़ी में किसी की मृत्यु हो जाए तो एक मास के बाद अथवा सूतक निवृत्ति होने पर शांति करके विवाह करने में हानि नहीं।

विवाह के पूर्व नांदीमुख श्राद्ध के बाद तथा विनायक स्थापन (बड़ा विनायक) हुए बाद तीन पीढ़ी तक की मृत्यु हो जाए तो वह कन्या तथा वर के माता-पिता को अशौच नहीं लगता है। निश्चित समय पर विवाह कर देना चाहिए।
गुरु ग्रह : महिला की कुंडली के योग:-
गुरु अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक सौम्य, बलवान, कोमलवृतिक, ज्ञान-प्रदाता एवं शुभ ग्रह है। गुरु धन- मीन राशि का स्वामी (स्वग्रही) कर्क में उच्च का, मकर में नीच का, सूर्य-चंद्र-मंगल का मित्र, शनि-राहु-केतु में सम तथा बुध-शुक्र का शत्रु है। गुरु पाँचवें घर का कारक तथा अकेला लग्न का गुरु समस्त दोषकारक होता है।

जिस घर में बैठता है उसको बिगाड़ता है, परंतु जिस भाव को देखता है उसे लाभ पहुँचाता है। गुरु शरीर की शक्ति और ज्ञानकारक तथा सुख, समृद्धि, संतान देने वाला और धर्म-अध्यात्म में रुचि बढ़ाता है। शुभ भाव में निर्दोष गुरु राजयोग बनाता है। कहा गया है 'किं कुर्वति ग्रहा सर्वे भस्म केंद्रे बृहस्पति'- केंद्रस्थ गुरु सौ दोष दूर करता है, परंतु शत्रुग्रहयुक्त, अस्त तथा शत्रु क्षेत्र में न हो।


महिला की कुंडली में गुरु की भूमिका- गुरु महिलाओं का सौभाग्यवर्द्धक तथा संतानकारक ग्रह है। जन्म कुंडली में गुरु 1/2/4/5/11/12 में शुभ फल तथा 3/6/7/8/10 में अशुभ फल देता है। स्त्रियों की कुंडली में गुरु 7वें तथा 8वें भाव को अधिक प्रभावित करता है। मकर-कुंभ का अकेला गुरु पति-पत्नी के सुख में कमी लाता है। जलतत्वीय या कन्या राशि का सप्तम का गुरु होने पर पति-पत्नी के संबंध मधुर नहीं रहते।

सप्तम में शुभ गुरु व मीन-धनु का होने पर विवाह विच्छेद की स्थिति बनाता है। गुरु शनि से प्रभावित होने पर विवाह में विलंब कराता है। राहु के साथ होने पर प्रेम विवाह की संभावना बनती है। महिला कुंडली में आठवें भाव में बलवान गुरु विवाहोपरांत भाग्योदय के साथ सुखी वैवाहिक जीवन के योग बनाता है। आठवें भाव में वृश्चिक या कुंभ का गुरु ससुराल पक्ष से मतभेद पैदा कराता है।

(1) गुरु यदि वृषभ-मिथुन राशि और कन्या लग्न में निर्बल-नीच-अस्त का हो तो वैवाहिक जीवन का नाश कराता है।
(2) 1/5/9/11 का गुरु बली होने पर जल्दी विवाह के योग बनाता है, परंतु वक्री, नीच, अस्त, अशुभ, कमजोर होने पर विलंब।
(3) मकर-कुंभ लग्न में सप्तम का गुरु भी वैवाहिक जीवन समाप्त कराता है।
(4) कारक गुरु मिथुन-कन्या का गुरु लग्न या सप्तम में हो तो अति शुभ होता है।
(5) अत्यंत प्रबल गुरु चंद्र-मंगल से उत्तम तालमेल होने पर वैवाहिक जीवन सफल होता है।
(6) मेष लग्न में विवाह में विलंब सप्तम का गुरु कराता है।
(7) कर्क-सिंह लग्न में 7/8 भाव का गुरु शुभ होने से वैवाहिक जीवन शुभ रहता है।
(8) वृश्चिक-धनु-मीन लग्न का गुरु वैवाहिक जीवन सुखी बनाता है तथा सहायक होता है। मीन राशि का गुरु सप्तम में होने पर वैवाहिक जीवन कष्टप्रद रहता है।

अनुभव से ज्ञात हुआ है कि गुरु का फल शुभ कम मिलता है। पुराणों में उच्च गुरु के अशुभ फल वर्णित है-
जन्म लग्ने गुरुश्चैव रामचंद्रो वनेगतः
तृतीय बलि पाताले, चतुर्थे हरिश्चंद्र,
षष्टे द्रोपदी चीरहरण च हंति रावणष्ट मे,
दशमे दुर्योधन हंति द्वादशे पांडु वनागतम्‌


कुंडली बताएगी मृत्यु का रहस्य:-

किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली को देखकर उस व्यक्ति के रोग एवं उसकी मृत्यु के बारे में जाना जा सकता है। यह भी बताया जा सकता है कि उसकी मृत्यु किस रोग से होगी। ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक जन्मकुंडली में छठवाँ भाव रोग, आठवाँ भाव मृत्यु तथा बारहवाँ भाव शारीरिक व्यय व पीड़ा का माना जाता है। इन भावों के साथ ही इन भावों के स्वामी-ग्रहों की स्थितियों व उन पर पाप-ग्रहों की दृष्टियों व उनसे उनकी पुत्रियों आदि को भी देखना समीचीन होता है।

यही नहीं, स्वयं लग्न और लग्नेश भी संपूर्ण शरीर तथा मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है। लग्न में बैठे ग्रह भी व्याधि के कारक होते हैं। लग्नेश की अनिष्ट भाव में स्थिति भी रोग को दर्शाती है। इस पर पाप-ग्रहों की दृष्टि भी इसी तथ्य को प्रकट करती है। विभिन्न ग्रह विभिन्न अंग-प्रत्यंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे बुध त्वचा, मंगल रक्त, शनि स्नायु, सूर्य अस्थि, चंद्र मन आदि का। लग्न में इन ग्रहों की स्थिति उनसे संबंधित तत्व का रोग बताएगी और लग्नेश की स्थिति भी।


प्रत्येक कुंडली, लग्न, चंद्रराशि और नवमांश लग्न से देखी जाती है। इसका मिलान सूर्य की अवस्थिति को लग्न मानकर, काल पुरुष की कुंडली आदि से भी किया जाता है। छठवाँ भाव रोग का होने के कारण उसमें बैठे ग्रहों, उस पर व षष्टेश पर पाप ग्रहों की दृष्टियों व षष्टेश की स्थिति से प्रमुखतया रोग का निदान किया जाता है। इनके अतिरिक्त एकांतिक ग्रह भी विभिन्ना रोगों का द्योतक है। जन्मकुंडली में छठवाँ, आठवाँ और बारहवाँ भाव अनिष्टकारक भाव माने जाते हैं। इनमें बैठा हुआ ग्रह एकांतिक ग्रह कहा जाता है। यह ग्रह जिन भावों का प्रतिनिधित्व करता है, उससे संबंधित अंग रोग से पीड़ित होता है।


यही नहीं, वह जिस तत्व यथा बुध त्वचा, मंगल रक्त आदि जैसा कि ऊपर बताया गया उससे संबंधित रोग वह बताएगा। ज्योतिष शास्त्र में 'भावात्‌ भावम्‌' का सिद्धांत भी लागू होता है।

इसका आशय यह है कि छठवें से छठवाँ अर्थात एकादश भाव भी रोग का ही कहलाएगा। इसी भाँति आठवें से आठवाँ अर्थात तृतीय भाव भी मृत्यु का माना जाएगा और बारहवें से बारहवाँ अर्थात पुनः एकादश भाव शारीरिक व्यय अथवा पीड़ा का होगा। इस दृष्टि से भी ऊपर निर्दिष्ट कुंडलियों का मिलान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त सुदर्शन से रोग देखा जाता है। यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो वह अपनी शुभता खो देता है और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है।

आठवाँ व बारहवाँ भाव मृत्यु और शारीरिक क्षय को प्रकट करता है, जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है। लग्न व लग्नेश आयु को दर्शाता है, इसकी नेष्ट स्थिति भी आयु के लिए घातक होती है। यहाँ पर एक और बात का ध्यान रखना उपयुक्त होगा। राहु व शनि जिस भाव व राशि में बैठा होता है, उसका स्वामी भी उनका प्रभाव लिए होता है। वह जिस भाव में बैठा होगा या जिस भाव पर वह अपनी दृष्टि डालेगा, उस पर राहु व शनि प्रभाव भी अवश्य आएगा। राहु मृत्युकारक ग्रह है तो शनि पृथकताकारक।

यह स्थिति भी मृत्युकारक होगी या उस अंग को पृथक करेगा। कभी-कभी यह बात ध्यान में नहीं रखने के कारण फलादेश गलत हो जाता है। गोचर ग्रहों के साथ-साथ महादशा व अंतर्दशा से भी फलादेश का मेल खाना अत्यंत आवश्यक होता है। जातक की जन्म कुंडली से उसके किसी भी रिश्तेदार के रोग व उसकी मृत्यु का पता लगाया जा सकता है।

मान लीजिए कि कर्क लग्न है, जिसका स्वामी चंद्र है जो जल व मन का प्रतिनिधित्व करता है। यह पाँचवें भाव में अवस्थित है। एकादश भाव बड़े भाई या बड़ी बहन का है। इसका स्वामी निश्चित तौर पर बड़ी बहन को दर्शाएगा स्त्री ग्रह होने के कारण। शनि भाग्य भाव में बैठकर तीसरी दृष्टि से इस भाव को देख रहा है। वह स्नायु का प्रतिनिधित्व करता है।

स्पष्ट है कि जातक की बड़ी बहन स्नायु से संबंधित रोग से ग्रस्त होगी। अब यदि ग्यारहवें भाव को लग्न मानें तो इससे छठवाँ भाव आठवाँ होगा जो बहन की मृत्यु का भाव है। इसे भी शनि दसवीं दृष्टि से देख रहा है। यही नहीं यहाँ पर केतु भी बैठा हुआ है, जो इस रोग को बढ़ा रहा है। बहन का लग्नेश शुक्र उसी के लग्न से बारहवाँ होकर राहु के साथ बैठा हुआ है।

राहु भी शनिवत होता है और स्नायु का प्रतिनिधित्व करता है। स्पष्ट है कि ग्रहों की सारी स्थितियाँ इस जन्म कुंडली में उसकी बहन का स्नायविक रोग और उससे उसकी मृत्यु को दर्शाता है। इसी भाँति प्रत्येक कुंडली का विश्लेषण करके उसके रोग व उसकी मृत्यु को जान सकते हैं। रोग की परिभाषा के अनुसार तत्संबंधी भावों, उनके स्वामियों, लग्न व लग्नेश स्थिति और उस पर पापी ग्रहों की युति व उनकी दृष्टियों से उस रोग व उससे जातक की मृत्यु को जाना जा सकता है।
क्या करें यदि जन्मकुंडल‍ी‍ न हो :-
ज्योतिष के सारे नियम व अवधारणाएँ मुख्यत: जन्मकुंडली के आधार पर फलित होती है। ऐसे में उन लोगों के लिए समस्या खड़ी हो जाती है, जो किसी कारण वश अपने जन्म की दिनांक या समय आदि ठीक से नहीं जानते। कुंडली के अभाव में उनके सामने कई चीजें स्पष्ट नहीं हो पाती।

इस स्थिति में हमारा हाथ हमारी सहायता कर सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली‍ में एक प्रधान ग्रह होता है, चाहे वह किसी भी भाव का स्वामी हो। उस ग्रह के अनुसार ही मनुष्‍य का जीवन प्रभावित होता है। यदि इन ग्रहों का पता लगाकर उन्हें मजबूत किया जाए तो जीवन की दिशा बदली जा सकती है।

सर्वप्रथम अपने हाथ को गौर से देखें। पाँचों ऊँगलियों की जड़ों पर जो उभार है, वे पर्वत कहलाते हैं। तर्जनी से अँगूठे तक ये क्रमश: गुरु, शनि, सूर्य, बुध और शुक्र पर्वत को‍ दिखाते हैं। हाथ के बी‍च में क्रमश: मंगल, राहु और केतु के पर्वत होते हैं। प्रत्येक पर्वत को दबाकर देखें।

जो पर्वत उभरा हुआ है, जिस पर कोई कटी-फटी रेखाएँ या दाग-धब्बे-तिल आदि नहीं है, वे आपके मजबूत ग्रह है। इसके विपरीत दबे हुए, कटी-फटी रेखाओं वाले पर्वत नीच ग्रह माने जाएँगे। रेखाएँ सीधी हो तो शुभ हैं, आड़ी या एक-दूसरे को काटने वाली रेखाएँ शुभ नहीं हो‍ती।

अब उभरे पर्वतों को देखें। इनमें से सबसे मजबूत और साफ-सुथरा पर्वत चुनें। यह आपका प्रतिनि‍धि ग्रह होगा जिसको मजबूत करने से, जिसका रत्न पहनने से या जिसका मंत्र जाप करने से आपको लाभ मिलेगा।

अब दबे हुए पर्वतों को देखें। ये वो ग्रह है जो आपको परेशानी दे सकते हैं। विशेषकर नीच का शनि, गुरु बेहद कष्‍ट देते हैं। इनका जप दान करना उचित होता है।

प्रतिनिधि ग्रह इष्‍ट देव रत्न दान सामग्री
गुरु विष्‍णु पुखराज पीली वस्तुएँ
शुक्र देवी के रूप हीरा सफेद मिठाई
शनि शिव जी नीलम काली वस्तुएँ
सूर्य गायत्री, विष्णु माणिक सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध गणेश पन्ना हरी वस्तु
मंगल हनुमानजी मूँगा लाल वस्तुएँ
चंद्र शिवजी मोती सफेद वस्तु

विशेष : राहु और केतु पर्वतों के खराब होने पर क्रमश: सरस्वती और गणेश जी की आराधना करना लाभ देता है। 'ऊँ रां राहवे नम:' और 'ऊँ कें केतवे नम:' के जाप से भी ये ग्रह शां‍त होते हैं।






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