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आरती
ॐ जय जगदीश हरे प्रभु जय जगदीश हरे |
प्रभुका चरण उपासक-२ कति-कति पार तरे ||||
ॐ जय जगदीश हरे .....
मनको थाल मनोहर प्रेम रुप वाती -प्रभु प्रेम रुप वाती |
भावकपुर छ मङ्गल -२ आरती सब भाती || ||
ॐ जय जगदीश हरे....
नित्य-निरन्जन-निर्मल कारण अविनाशी - प्रभु... |
शरणागत प्रतिपालक-२ चिन्मय सुख राशी ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
सृष्टिस्थितिलय कर्ता त्रिभुवनका स्वामी-२ |
भक्ति सुधा वर्षाउ -२ शरण पर्यौ हामी ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
आसुरभावनिवारक तारक सुखदाता-२ |
गुण अनुरुप तिमि ह्वौ-२ हरि हर अनि धाता ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
युग-युग पालन गर्छौ अगणितरुप धरि-२ |
लिलामय रस विग्रह -२ करुणामूर्ती हरि ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
समताशान्ति प्रदायक, सज्जनहितकारी -२ |
चरण शरण अव पाऔ-२ प्रभु भव भय हारी ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
सम्यम सुर सरिताको अविरल धार बहोस् -२ |
जति-जति जन्म भए पनि-२ प्रभुमा प्रेम रहोस् ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
प्रेम सहित शुभ आरती जसले नित्य गर्यो -२ |
दिन-दिन निर्मल वन्दै-२ त्यो भव सिन्धु तर्यो ||||
ॐ जय जगदीश हरे....
ॐ जय जगदीश हरे प्रभु जय जगदीश हरे |
प्रभुका चरण उपासक-२ कति-कति पार तरे ||१०||
ॐ जय जगदीश हरे ...


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